Saturday, September 13, 2014

नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू ही सही

नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरजू ही सही

न तन में खून फ़राहमन अश्क़ आँखों में
नमाज-ए-शौक तो वाजिब है बे वजू ही सही

नहीं विसाल मयस्सर तो आरजू ही सही

किसी तरह तो जमे बज़्म मयकदे वालो
नहीं जो वादा-ओ- सागर तो हाओ-हू ही सही

गर इंतज़ार कठिन है तो जब तलक-ए- दिल
किसी के वादा-ए -फ़र्दा की गुफ्तगू की सही

नहीं विसाल मयस्सर तो आरजू ही सही

दयार-इ-गैर में महरम अगर नहीं कोई
तो फैज़ जिक्र-इ-वतन अपने रू-ब -रू ही  सही

नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरजू ही सही

फैज़ अहमद फैज़ 

Saturday, August 30, 2014

मेरे करार में नसीब बेकरारी है

इस मकान में घर की तलाश जारी है
मेरे करार में  नसीब  बेकरारी है 

इंसान का चेहरा और दिल संग सा लिए  
मेरे हमनवाज़ों की क्या अदाकारी है

मेरे करार में  नसीब  बेकरारी है

रिश्ते तोड़ के जीत जाना  तो आसान था  
बचाने को रिश्ते हमने दिलकी बाज़ी हारी है

मेरे करार में  नसीब  बेकरारी है

जिस्म का मिलना भी कोई मिलना है
रूह से रूह की जो अगर पर्दागारी  है

मेरे करार में  नसीब  बेकरारी है

रहकर जिन्दा  न हमें मिल सका सुकू
मौत को अब मयस्सर जिंदगी हमारी है

मेरे करार में  नसीब  बेकरारी है

इस मकान में घर की तलाश जारी है


मेरे करार में  नसीब  बेकरारी है 

भावार्थ