Friday, October 17, 2014

इस कलिजुग में कैसे इंसान भरे हैं

शिवालय है खाली मदिरालय भरे हैं 
इस कलिजुग में कैसे इंसान भरे हैं

नशे में नचनियों पे जो हैं पैसे उड़ाते
बेबस भिखारी से वो हैं नज़रें बचाते

माया के जंजाल में ये आ पड़े हैं
इस कलिजुग में कैसे इंसान भरे हैं

माँ बाप के जो न बन सके आस हैं
अजनबी दोस्तों के वो बने ख़ास हैं

रिश्तो को बस बोझ  माने पड़े हैं
इस कलिजुग में कैसे इंसान भरे हैं

कथनी से करनी तक यहाँ सब झूठ है
आंसू से लहू तक की यहाँ सब लूट है

मत खोल लब यहाँ सब गद्दार भरे हैं
इस कलिजुग में कैसे इंसान भरे हैं

शिवालय है खाली मदिरालय भरे हैं 
इस कलिजुग में कैसे इंसान भरे हैं

भावार्थ 





Saturday, September 13, 2014

नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू ही सही

नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरजू ही सही

न तन में खून फ़राहमन अश्क़ आँखों में
नमाज-ए-शौक तो वाजिब है बे वजू ही सही

नहीं विसाल मयस्सर तो आरजू ही सही

किसी तरह तो जमे बज़्म मयकदे वालो
नहीं जो वादा-ओ- सागर तो हाओ-हू ही सही

गर इंतज़ार कठिन है तो जब तलक-ए- दिल
किसी के वादा-ए -फ़र्दा की गुफ्तगू की सही

नहीं विसाल मयस्सर तो आरजू ही सही

दयार-इ-गैर में महरम अगर नहीं कोई
तो फैज़ जिक्र-इ-वतन अपने रू-ब -रू ही  सही

नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरजू ही सही

फैज़ अहमद फैज़