Sunday, November 16, 2014

देख समंदर लगता है मुझे



देख समंदर लगता है मुझे 
मैं तो हूँ लहरों  की तरह 

कभी गुम सुम कभी बेबाक 
पल पल अंदाज़ बदलता है 
कभी दर्द से हो चीख रहा  
दरिया यूँ आवाज़ बदलता है 
चेहरा हूँ इस दरिया का 
मैं तो हूँ लहरों  की तरह 

कभी कनक तो कभी चांदी 
रंग ओढ़ लू मैं उस बादल का 
कभी रात की मदहोशी लिए 
रंग ओढूँ हवा के आँचल का  
हर रंग लिए बेरंग है जो 
मैं तो हूँ लहरों  की तरह  

देख समंदर लगता है मुझे 
मैं तो हूँ लहरों  की तरह 

इश्क़ नहीं हमदम से मुझे 
रिश्ता तो फिर भी निभाना है 
जाना है रोज उसी साहिल पे 
जिस पर जाकर मिट जाना है
जिसमें बने और उसी में मिटे 
मैं तो हूँ लहरों  की तरह 

देख समंदर लगता है मुझे 
मैं तो हूँ लहरों  की तरह 

भावार्थ 
१६/ ११/ २०१४ 
डरबन, साऊथ अफ्रीका 

Friday, November 14, 2014

क्या रंग है तेरे जनाजे का

क्या रंग है तेरे जनाजे का
तू देख सही तो जरा उठ कर

जो धरती कभी लहराती थी
वो आज बनी फिरती बंजर

प्यालों से शामें सजती थी जहाँ
अब रात बिछी कालिख बन कर

हर कौने में बसती थी हंसी जहाँ
अब बहता है दर्द हवा बन कर

जो जो थे तुझे दिल से प्यारे
भूल गए सब  एक एक कर

तू भी जो कल तक एक हस्ती थी
अब रह गयी एक लम्हा बनकर

क्या रंग है तेरे जनाजे का
तू देख सही तो जरा उठ कर

भावार्थ 
१४/११/२०१४