Sunday, May 24, 2015

ग़ालिब की कलम से

जिंदगी अपनी जब इस शक्ल में गुज़री ग़ालिब
हम  भी क्या याद करेंगे के हम  खुदा  रखते थे




Thursday, May 21, 2015

तू आरजू तू तमन्ना

तू आरजू तू तमन्ना
तू हसरत  ही नहीं बस

इन खाबो  से भी  परे
एक शख्शियत है  तेरी
मर्द के एहसासों से परे
एक कवायद  है तेरी

तू सुरूर तू चाहत  
तू नज़ाकत  ही नहीं बस

तेरे अरमान भी तो
नयी परवाज़ रखते हैं
तेरे उनमान भी तो
अपने कई नाम रखते हैं

तू हया तू श्रृंगार
तू मोहब्बत  ही नहीं बस

तुझमें  दर्द भी रहता है
एक परछाई सी बनकर
आँखों में काजल बहता है
इक तन्हाई सी बनाकर

तू तरंग तू उमंग
तू इबादत ही नहीं बस

तू आरजू तू तमन्ना
तू हसरत  ही नहीं बस


 भावार्थ 
२२/०५/२०१४